प्रकृति की आभा
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पग-पग धरा का मोहे मन
निकट नदी का दृश्य मनोरम,
प्रभात काले मनभावन
बिहंग कलरव की ध्वनि अनंत
पग-पग धरा का मोहे मन
हरित धरा की छटा निराली
गेंदा-गुलाब पुष्प नव-नवल,
भंवरे गायें मधुर रागिनी
सरिता संग खेलें हंस-बतख
पग-पग धरा का मोहे मन
सुबह-सुबह का दृश्य मनोहर
कितनी मोहक है मलय पवन
धुली हुई है डाली-डाली
वृष्टिपश्चात् इंद्रायुध ने मोहा मन
पग-पग धरा का मोहे मन
जी चाहें अब त्यागूं भ्रमण
बहुत हो गई मधुर सुगंध
लोभ जाल से निकल न पाऊं
पुष्प वाटिका की सूखी डाली
टूटे पत्तों ने समझाया
उत्पन्न बीज का अंत अटल
पग-पग धरा का मोहे मन